Vedic Astrology

ज्योतिष” इस शब्द का अर्थ हैं प्रकाशमान करनाअन्धकार का नाश करना. हमारे पूर्वजो ने मनीषियों नेऋषि मुनियों ने इस शास्त्र का अभ्यास करके सूत्र रूप में हमें यह दिव्य ज्ञान प्रदान किया हैं जिसके माध्यम से साधारण मनुष्य के दुःख / कष्ट नष्ट होकर वह जीवन का आनंद ले सके और अपने जीवन को सार्थक कर सके इसी कारण ज्योतिष को वेदों के नेत्र / चक्षु / आँख कहा गया हैं|                                                                                                                                                                                                                                        
-: ग्रहों के प्रभाव :-
सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं संमन्गलम् मङ्गलः
सदबुद्धिं च बुधौ गुरुश्च गुरुताम् शुक्रः सुखम् शं शनिः |
राहुर्बाहुबलं करोतु विपुलं केतुः कुलस्योन्नतिं
नित्यं प्रितिकरा भवन्तु सततं सर्वे प्रसन्ना ग्रहाः ||
अर्थात :- भगवान श्री सूर्यनारायण पराक्रम, चन्द्र श्रेष्ठ पद, मंगल शुभ, वुध सदबुद्धि, गुरु गौरव, शुक्र सुख, शनि कल्याण, राहू विपुल बाहुबल एवं केतु परिवारको उन्नति प्रदान करते हैं |
इस प्रकार सभी ग्रह निरंतर प्रसन्न रहकर हमारी रक्षा करते हैं |
-: जन्मपत्रिका के बारह भाव :-
जन्म कुंडली में १२ भाव/स्थान होते है ।
प्रथम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- लग्नं देहोदयाख्यं रूपं शीर्षं वर्तमानं च जन्म |
अर्थ :- जन्म, देह उदय (प्रारम्भ), रूप, सिर, वर्तमान काल इन सब का विचार प्रथम स्थान से होता है ।
द्वितीय भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- वित्तं विद्या स्वान्न् पानानि भुक्तिंदक्ष अक्ष्यासं वाक्कुटुम्बम् |
अर्थ :- धन, विद्या, घर, भोजन, चेहरा, दहिना नेत्र, वाणि (बोलने की शक्ति), कुटुम्ब इन सब विषयो का विचार द्वितीय भाव से होता है ।
तृतीय भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- उरु दक्षकर्णं च सेनां धैर्यं शौर्यं विक्रमं भ्रातरं च ||
अर्थ :- छाती, दाहिना कान, सेना, हिम्मत, वीरता, शक्ति, छोटे भाई-बहन इन सब विषयो का विचार तृतीय भाव से होता है ।
चतुर्थ भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- गृहम् वाहनं मातरं गोमहिष वस्त्र भुषाः सुख ||
अर्थ :- घर, वाहन, माता, गाय, भैस, वस्त्र, अलन्कार (जेवर), सुख इन सब विषयो का विचार चतुर्थ भाव से होता है ।
पंचम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- राजाङ्कं सचिव करात्मधी भविष्यज्ञानं सुत जठर श्रुतिस्मृतीश्च ||
अर्थ :- राजशासन, मंत्री, कर, आत्मा, बुद्धि, भविष्य ज्ञान, संतान, पेट, वेद, शास्त्र ज्ञान इन सब विषयो का विचार पंचम भाव से होता है ।
षष्ठ भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- ऋणास्त्रचोर क्षतरोगशत्रून ज्ञात्याजि दुष्कृत्यघ भीत्यवज्ञाः ||
अर्थ :- कर्जा, अस्त्र, चोर, घाव (चोट), रोग, शत्रु, ज्ञाति शत्रु (परिवार के भाई, बंधू जो शत्रुता रखते हो), दुष्ट कर्म (पाप), भय, अपमान इन सब विषयो का विचार षष्ठ भाव से करते है ।
सप्तम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- जामित्र चित्तोत्थमदात्तकामान द्युनाध्वलोकान् पतिमार्ग भार्याः ||
अर्थ :- हृदय की इच्छाए, काम, वासना, मद, मार्ग, जनता, पति, पत्नी इन सब विषयो का विचार सप्तम भाव से करते है ।
अष्टम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- माङ्गल्यरन्ध्रमलिनाधिपराभवायुः | क्लेशापवादमरणाशुचिविघ्नदासान ||
अर्थ :- माङ्गल्य (स्त्री का सौभाग्य / पति क जीवित रहना आदी), रन्ध्र, मानसिक चिन्ता, हार, आयु, क्लेश, बदनामी, मृत्यु, विघ्न, अपवित्रता, नौकर इत्यादी विषयो का विचार अष्टम भाव से किया जाता है ।
नवम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- आचार्यदैवपितृन् शुभपूर्वभाग्य | पूजातपः सुकृतपौत्र जपार्यवंशान् ||
अर्थ :- आचार्य (गुरु), देवता (आराध्य देवता), पिता, पूजा, पूर्वभाग्य (तप, सत्कर्म), पौत्र, उत्तम वंश इत्यादी विषयो का विचार नवम भाव से किया जाता है ।
दशम भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- व्यापारास्पदमानकर्मजयसत्किर्तिम् ऋतुं जीवनं | व्योमाचारगुणप्रवृत्ति गमनान्याज्ञां च मेषूरणम् ||
अर्थ :- व्यापार, उच्च स्थान, इज्जत, कर्म, जय, यश, यज्ञ, जीविका का उपाय, कार्य में अभिरुचि, आचार (सदाचार अथवा दुराचार), गमन (पतन होना), हुकूमत, गुण, आज्ञा इत्यादी विषयो का विचार दशम भाव से किया जाता है ।
एकादश भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- लाभायाग मनाप्ति सिद्धि विभवान् प्राप्तिं भवं श्लाघ्यतां |
ज्येष्ठ भ्रातरमन्यकर्णसरसान् संतोषमाकर्णनम् ||
अर्थ :- लाभ, आमदनी, प्राप्ति, आगमन, सिद्धि, वैभव, धन, ऐश्वर्य, कल्याण, प्रशंसा, बड़ा भाई अथवा बहन, अच्छी खबर इत्यादी विषयो का विचार एकादश भाव से किया जाता है ।
द्वादश भाव से विचारणीय विषय इस प्रकार है ।
श्लोक :- दुःखान्ध्री वामनयनक्षयसूचकांत्य | दारिद्र्यपापशयन व्ययरिःफबन्धान ||
अर्थ :- दुःख, पैर, बाया नेत्र, ह्रास, चुगलखोर, अन्त, दरिद्रता, पाप, शयन, खर्च, बंधन इत्यादी विषयो का विचार द्वादश भाव से किया जाता है ।
-: राशि एवं स्वामी :-
भौमः शुक्रबुधेन्दु सूर्यशशिजाः शुक्रार जिवार्कजाः |
मन्दो देवगुरुः क्रमेण कथिता मेषादि राशीश्वराः ||

अर्थात :- मेष और वृश्चिक राशियों के स्वामी मंगल, वृषभ और तुला राशियों के स्वामी शुक्र, मिथुन और कन्या राशियों के स्वामी बुध, कर्क राशि के स्वामी चन्द्र तथा सिंह राशि के स्वामी सूर्य है, धनु और मीन राशियों के स्वामी गुरु, मकर और कुम्भ राशियों के स्वामी शनि होते है ।
-: पंचांग तथा मुहूर्त :-
तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण इन पञ्च अंगो से पंचांग की उत्पत्ति होती है तथा किसी भी कर्म विशेष के लिए इन पंचांगों की शुद्धि ही “मुहूर्त” कहलाता है |
किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले पंचांग शुद्धि देख कर कर्म के अनुसार शुभ मुहूर्त अवश्य देखे | ऐसा करने से हमेशा कार्य वृद्धि होती है तथा कर्म सफल होता है |
भविष्य के प्रति सचेत रहना तथा भावी अनिष्ट से खुद को बचाना यह मुहूर्त की विशेषता हैं जिससे खुद को तथा शुभारम्भ किये हुए कर्म / कार्य को टिकाके रखने में मदद मिलती हैं |
|| ॐ तत् सत् ||